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मैं जिन अंधविश्वासों में बड़ा हुआ-

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जहां भारत की बात हो लेकिन उसके अंधविश्वास की बात ना हो, ऐसा क्या हो सकता है?  अंधविश्वास के बिना तो भारत की व्याख्या अधूरी है। भारत में आप किसी भी जगह चले जाइए आपको अंधविश्वास का अलग अलग चेहरा देखना को मिलेगा। लेकिन कुछ अंधविश्वास ऐसे है जो शायद पूरे भारत मे स्वीकार्य हैं, उन्हीं की चर्चा में इस लेख में करने जा रहा हूं।      शहर हो या गाँव, अंधविश्वास अपनी जड़ जमाये हुए हर जगह मिलेगा लेकिन गाँवों में इसका रूप कुछ ज्यादा ही है, जिसकी वजह ग्रामीणों की अज्ञानता व अशिक्षा को कहा जा सकता है। गाँवों में ज्यादर लोग खेती करते है लेकिन अब यह स्थिति धीरे- धीरे बदल रही है और युवा अन्य रोजगारों की और अग्रसर हो रहे हैं, सरकारी नौकरियों में भी जा रहे हैं। लेकिन ग्रामीण युवाओं का ज्यादातर प्रतिशत C और D ग्रेड की और ही आकर्षित होता है। इसका एक कारण तो यह है कि उनके घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है जिस वजह से उच्च शिक्षा प्राप्त करने से वे वंचित हो जाते है और जल्दी से ििइंटरमीडिएट या ग्रेजुएशन करने के बाद कोई जॉब कर घर की जिम्मेदारी संभालना उनकी प्राथमिकता बन जाता है। इस वजह स...

“क्यों ज़रूरी है हमारा अपने माता-पिता से सवाल करना”

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              जब से केंद्र में BJP की सरकार है तब से वामपंथियो ने भारतीय सँविधान खतरे में है, बोलकर अपना विरोध जारी रखा है। सड़कों पर हम डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी चिल्ला रहे है लेकिन खुद हमारे परिवारों में डेमोक्रेसी की जगह सामंतवाद अपनी जड़ जमाये बैठा है और उसका विरोध करना तो दूर हमारा उस दिशा में ध्यान भी नहीं जाता है। 1947 में आजाद होने के बाद हमें सँविधान के जरिए अनेक अधिकारों की प्राप्ति हुई। हमें लगा कि हम आधुनकि युग मे आ पहुँचे है जहां सामंतवाद का कोई चिन्ह नही है लेकिन वास्तविकता इसके उलट है क्योंकि सामंतवाद अब भी अपना अस्तित्व रखता है और इसके दर्शन करने के लिए आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं हैं,सिर्फ अपने परिवार की जीवनशैली पर नजर डालने की जरूरत है।               हम सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे है कि हमारी स्वतंत्रता खतरे में है लेकिन अपने माँ-बाप का विरोध करने की शक्ति हमारे अंदर नही है। क्योंकि अगर हम विरोध करेंगे तो आदर्श पुत्र/पुत्री कैसे कहलायेंगे। बचपन से ही हमे प्रश्न करने पर डाँट- फटकार लगती है...

भारतीय पारिवारिक संस्था के गुण व दोष

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          भारतीय पारिवारिक संस्था को सबसे आदर्शवादी संस्थाओं में से एक माना जाता है। सयुंक्त परिवार प्रणाली, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, बड़ो के प्रति आदर करना, महिलाओं को देवी मानना लेकिन फिर भी उनको दोयम दर्जा देना, बूढों की सेवा, सात जन्मों का वैवाहिक साथ जैसे कारक भारतीय पारिवारिक संस्था में पाए जाते है।              पहले मैं बताता हूँ कि इस संस्था के लाभ कौन-कौन से हैं। प्रथम तो यही की हमारे खुद आत्मनिर्भर होने तक हमारा लालन -पालन, पढ़ाई, व रोजमर्रा के अनेक ख़र्चे माता- पिता अपना दायित्व समझकर उठाते हैं। अपने बच्चों की शादी अपने हिसाब से करना भारतीय परिजन अपना फर्ज समझते है। अरेन्ज मैरिज जैसी व्यवस्था का पैदा होना इसी फर्ज का परिणाम है। हालांकि यह व्यवस्था भारतीय पारिवारिक संस्था का गुण नही बल्कि दोष है लेकिन मेरे जैसे लोगो के  लिए फायदेमंद साबित होती है जिनके लिए लड़की को पटाने का काम टेढ़ी खीर के समान है। इसके अलावा हमारा परिवार उस समय हमारा साथ देता है जब कोई हमारे साथ नही होता। प्रत्येक मुसीबत में परिवार हमारे साथ खड़ा...

धर्म के रखवाले आपके नसीब को ईश्वर का चमत्कार क्यों कहते हैं?

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              जब से मैंने तर्कों का रास्ता अख्तियार किया है तब से कुछ सवाल मेरे मन मे बार- बार उभर कर आ जाते है जिनका उत्तर खोजने के लिए मैं व्याकुल हूँ। मैं नास्तिक होते हुए भी आस्तिक लोगो द्वारा ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में दिये गए तर्कों पर विचार करने के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ। उनका पहला तर्क तो यही होता है कि ईश्वर के अस्तित्व की व्याख्या गीता, वेद, कुरान व बाइबिल जैसे पवित्र ग्रन्थ करते हैं। मेरा सवाल यह है कि अगर वास्तव में ईश्वर है तो इतने धर्म क्यों? क्योंकि ऐसा तो है नही कि वह ग्रह जहां ईश्वर रहता होगा वहाँ धर्म के अनुसार विभाग होंगे, जहाँ मृत्यु पश्चात गयी आत्मा को उसके धर्म के विभाग में भेजा जाता होगा। और अगर वास्तव में ये धर्म ग्रन्थ ईश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं तो इनको ईश्वर द्वारा लिखा होना चाहिए था ना कि मनुष्यों द्वारा। मनुष्यों ने इनको अपनी जरूरतों के हिसाब से खुद लिखा है। इसलिए अगर ध्यान से देखा जाए तो ये ग्रन्थ ईश्वर का नही मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  दूसरा प्रश्न मेरा यह है कि अगर एक पल के लिए मान लिया जाए क...

रिश्ते को ढ़ोने से बेहतर है उसे उतार फैंकना

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भारतीय संस्कृति रिश्तों को कुछ ज्यादा ही अहमियत देती है।इसका कारण व प्रभाव सयुंक्त परिवार कहे जा सकते हैं। पति-पत्नी को जीवनभर का साथी कहा जाता है। माता-पिता पर बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा आदि का दायित्व डाला जाता है। बदले में बच्चों से यह आशा की जाती है कि वे बुढ़ापे में अपने माता-पिता का सहारा बनेंगे। बहन-भाई अपने सुख- दुख को आपस में बांटकर आपस मे विश्वास की नींव को मजबूत करते हैं। इसके बाद आते है रिश्तेदार,जो हमारी कठिन परिस्थितियों में कंधे से कंधा मिलाकर चलते है।            रिश्ते एक विश्वास पर टिके होते है। जब तक वह विश्वास कायम है,आपका रिश्ता कायम है। अगर विश्वास में किसी कारणवश कोई कमी आती है तो उसकी पूर्ति करना मुश्किल हो जाता है। और अगर आप अपने रिश्ते के बीच विश्वास को दोबारा से कायम करना चाहते है लेकिन दूसरा सदस्य इसके लिए तैयार नही है तो यकीन मानिए आपको बहुत गिल्टी फील होगा, जो आपको यह ही याद दिलाएगा की मुझे विश्वास नही तोड़ना चाहिए था।             अब अगर ये रिश्ते अपनी निर्धारित सीमा में रहकर अपना निर्वहन कर...