तलाक को नकारात्मक रूप में लेना जरूरी नही.....

         
   आज किसी परिचित ने 'तलाक'विषय पर लिखने के लिए कहा। उनका मानना है कि तलाक़ को हमेशा बुरा ही नही माना जा सकता व इसको एक अच्छाई के रूप में भी मान्यता दी जा सकती है। यह मुद्दा इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हाल ही में मुस्लिम धर्म में प्रचलित तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गैरकानूनी घोषित किया गया था और सरकार से तीन तलाक़ पर कानून बनने के लिए कहा था लेकिन राज्यसभा के  शीतकालीन सत्र में कुछ विरोधाभास के कारण यह बिल पास नही हो सका। अतः मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात दिलाने वाले इस कानून का बजट सत्र तक इंतजार करना होगा।

  अब बात आती है हिंदू धर्म की महिलाओं की, हालांकि हिंदु महिलाएं अगर किसी मनमुटाव या अन्य कारण से वे अपने पति के साथ नही रहना चाहती हैं तो कहने के लिए उनको तलाक़ के माध्यम से शादी-विच्छेद का अधिकार मिला हुआ है लेकिन वास्तविकता इसके उलट है क्योंकि जिस धर्म मे शादी सात जन्मों का साथ निभाने का प्रतीक मानी जाती है, उस समाज मे तलाक को सकारात्मक कदम माना ही नही जा सकता। भारतीय समाज मे महिलाओं को दोयम दर्जे दिए जाने के कारण शिक्षा व रोजगार क्षेत्र में उनकी स्थिति सही नही है। जागरुकता के अभाव व आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नही होने के कारण खुद महिलाएं तलाक लेने से हिचकतीं है। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज यह सोचकर चलता है कि विवाह के पश्चात एक लड़की का घर उसका ससुराल होता है न कि मायका। इसी सोच के कारण ज्यादातर महिलाएं ससुराल में अनेक परेशानियों के होते हुए भी इसी को सच्चाई मानकर अपना जीवन व्यतीत कर देती है। इसके अलावा परिवार व समाज भी मतभेदों को भुलाकर वैवाहिक जीवन को ही लड़की का कर्तव्य बताकर तलाक न लेने की सलाह देता है।

हालाँकि वैवाहिक जीवन मे अनेक उतार -चढ़ाव आते है और कुछ मतभेदों को आसानी से बातचीत के माध्यम से सुलझाया भी जा सकता है लेकिन अगर मतभेदों की खाई कुछ ज्यादा ही गहरी हो तो तलाक का विकल्प ही बेहतर होता है। तलाक के बाद प्रायः यह देखा जाता है कि पति और पत्नी एक -दूसरे पर गलतियों का बोझ डालकर एक -दूसरे को घृणित भाव से देखते है और आपस में बातचीत के प्रत्येक साधन का गला घोंट देते है जबकि ऐसा नही होना चाहिए। क्योंकि इसका कुप्रभाव बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता है। अतः अपने मतभेदों का दंड बच्चों को नही देना चाहिए।

    अब आते है इस समस्या के समाधान की तरफ। जिस तरह से विवाह संस्था के माध्यम से यह व्यवस्था की गई है कि दो विपरीत लिंगी मनुष्य अपनी गृहस्थी शुरू कर सकते है वैसे ही तलाक द्वारा विवाह-विच्छेद की स्वीकृति समाज द्वारा मिलनी चाहिए। क्योंकि यह जरूरी नहीं प्रत्येक वैवाहिक युगल एक दूसरे को समझ ही पाएं। अरेंज मैरिज को भारतीयों द्वारा व्यापक रूप से अपनाने से एक दूसरे को समझने की सम्भावना और कम हो जाती है। अतः अगर तलाक से बचना ही है तो प्रेम विवाह को प्रोत्साहन दिया जा सकता है क्योंकि प्रेम विवाह में प्रेमी युगल एक- दूसरे को जानने के पश्चात ही शादी करने का फ़ैसला लेते है किन्तु तलाक की संभावना यहां भी रहती है लेकिन नगण्य रूप में।

    अतः तलाक को एक सकारात्मक कदम समझा जा सकता है बशर्ते लड़की को परिवार पर बोझ न माना जाये, तलाक के बाद एक दूसरे के प्रति घृणा की जगह सम्मान की भावना पैदा हो, पति के घर को लड़की की अर्थी उठने तक उसका घर न बताया जाए बल्कि वह अपनी मनमर्जी जहाँ भी रहे उसके फैसले का सम्मान किया जायें व महिलाओं को दोयम दर्जा न देकर उनको समाज मे बराबर का स्थान दिया जाए। लेकिन मुझे लगता है इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए भारतीय समाज को एक लंबी यात्रा करनी है तभी भारतीय समाज इन विचारों को स्वीकार पर पायेगा।
           
     
        

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