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शिक्षा की खस्ता हालत

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हाल ही में शिक्षा पर आयी ASER की रिपोर्ट भारतीय शिक्षा की खामियों पर चर्चा करने के लिए मज़बूर करती दिखती है। यह रिपोर्ट प्राथमिक शिक्षा पर प्रकाश डालती है और इसके प्रकाशित आंकड़े भारत के भविष्य के लिए शुभ संकेतों की परिभाषा की परिधि से बाहर है।   हालांकि ये रिपोर्ट प्राथमिक शिक्षा पर आधारित है लेकिन शिक्षा किसी भी स्तर पर सही नही कही जा सकती है और उसी का परिणाम है कि आज का ग्रेजुएट अपनी शिक्षा के स्तर के रोजगार की आवश्यक शर्तों पर खरा नही उतर पा रहा है। हालत इस हद तक खराब है कि पीएचडी धारक एक क्लर्क की जॉब पाने के लिए संघर्षरत है।  इसका एक कारण यह हो सकता है कि भारतीय शिक्षा व्यवाहारिक न होकर सैद्धांतिक ज्यादा है जोकि रोजगार की शर्तों को पूरा नही कर पाती। इसलिए भारत मे एक कहावत प्रचलित है कि'ये सब किताबी बातें है'। इन्ही किताबी बातों के कारण एक शिक्षित युवा रोजगार के लिए भटकता है।19वी सदी का पाठ्यक्रम 21वी सदी में पढ़ाकर 21वी सदी की मांगों को पूरा की चाहत रखना एक तरह रेगिस्तान में धान उगाने के विचार की तरह कही जा सकती है।  इसके अतिरिक्त भारतीय शिक्षा 'how to think' ...

तलाक को नकारात्मक रूप में लेना जरूरी नही.....

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             आज किसी परिचित ने 'तलाक'विषय पर लिखने के लिए कहा। उनका मानना है कि तलाक़ को हमेशा बुरा ही नही माना जा सकता व इसको एक अच्छाई के रूप में भी मान्यता दी जा सकती है। यह मुद्दा इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हाल ही में मुस्लिम धर्म में प्रचलित तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गैरकानूनी घोषित किया गया था और सरकार से तीन तलाक़ पर कानून बनने के लिए कहा था लेकिन राज्यसभा के  शीतकालीन सत्र में कुछ विरोधाभास के कारण यह बिल पास नही हो सका। अतः मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात दिलाने वाले इस कानून का बजट सत्र तक इंतजार करना होगा।   अब बात आती है हिंदू धर्म की महिलाओं की, हालांकि हिंदु महिलाएं अगर किसी मनमुटाव या अन्य कारण से वे अपने पति के साथ नही रहना चाहती हैं तो कहने के लिए उनको तलाक़ के माध्यम से शादी-विच्छेद का अधिकार मिला हुआ है लेकिन वास्तविकता इसके उलट है क्योंकि जिस धर्म मे शादी सात जन्मों का साथ निभाने का प्रतीक मानी जाती है, उस समाज मे तलाक को सकारात्मक कदम माना ही नही जा सकता। भारतीय समाज मे महिलाओं को दोयम दर्जे दिए जाने ...

कुछ धार्मिक मान्यताओं का खंडन

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             ज्यादातर धर्मों की यह मान्यता है कि आत्मा अनश्वर है और वह नश्वर शरीर के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराए रहती है। इसी मान्यता के कारण पुनर्जन्म की अवधारणा अस्तित्व में आयी।पुनर्जन्म कर्मों के सिचिंत फलों के आधार पर तय होता है,ऐसा धार्मिक ग्रंथों द्वारा बताया जाता है।मूर्तिपूजा, अवतारवाद,पुनर्जन्म, सिंचित कर्मों का फल जैसी मान्यताएं मानव के जहन में गहरी जड़ें जमाएं हुए है।                उपरोक्त मान्यताओं पर सवाल उठाने वालों को प्रायः चार्वाकी,लोकायती,व नास्तिक जैसे शब्दों से तिरस्कृत किया जाता है।लेकिन कुछ सवाल ऐसे है जो अनुत्तर ही रह जाते है।प्रायः हिंदू धर्म में विवाह का बंधन सात जन्मों तक माना जाता है लेकिन शायद यह कोई ही जनता होगा कि उसकी वर्तमान शादी पहले जन्म की है या आखिरी जन्म की।कही ऐसा तो नहीं कि सातवां जन्म यही हो और अगला जन्म बिछड़ने का जन्म हो। इसके अतिरिक्त एक सवाल यह उठता है जब हमें ना अगले जन्म की याद है ना पिछले जन्म की तो किस आधार पर यह मान लिया जाये कि पुनर्जन्म की अवधारणा सत...

एक अनसुलझी पहेली

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                  16000 गोपियों के साथ रासलीला करने का लक्ष्य रखने वाला व स्वयं को भगवान कृष्ण का अवतार बताने वाला कथित बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित का नाम, जो आश्रम में पड़े छापे के बाद वर्तमान में काफी चर्चित नाम बन चुका है, उस सूची में दर्ज हो गया जो जनता के धार्मिक विश्वास के साथ खिलवाड़ करने वाले बाबाओं के नाम से भरने की कगार पर है।                   लेकिन सोचने योग्य यह विषय है कि आसाराम बापू, निर्मल बाबा, रामपाल, राम रहीम जैसे अनेक पाखंडियों के नाम प्रत्येक वर्ष उजागर होते ही रहते है लेकिन इनके प्रति जनता के विश्वास में शायद ही कोई कमी आती है। इस सत्य की परख करने के लिए आपको सुबह टीवी ऑन करना पड़ेगा, जहाँ आस्था से संबंधित चैनलो पर भगवान का गुणगान करते लाखों की संख्या में भक्तों के दर्शन हो जाएंगे। आश्चर्य इस बात से होता है कि भारत में प्रत्येक परिवार किसी न किसी भगवान को अवश्य ही मानता है और शायद कोई भी भगवान गलत काम करने की प्रेरणा नही देता, तो फ़िर अपराध बढ़ क्यों रहे है। क्योंकि सामान्यतः...

सादगीपूर्ण शादी का संदेश

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        हाल ही में बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे उत्कर्ष की शादी कुछ विशिष्ट कारणों से ध्यान आकर्षित करती दिखती है।   बिना भोज और बैण्ड-बाजे से हुई इस शादी में जहाँ देहदान-अंगदान व दहेज़ रहित शादी के संकल्प के लिए अलग अलग काउंटर लगाये गए तो वहीं मेहमानों के लिए कार्ड छपवाने की बजाय ई-निमंत्रण कार्ड भेजे गए। प्रसाद स्वरूप 4-4 लड्डू मेहमानों को दिए गए और मेहमानों को शादी के लिए गिफ्ट लाने की मनाही थी। इसके अतिरिक्त 'स्वच्छ भारत' व 'खाली बोतलें डस्टबिन में डालें' जैसे संदेश लड्डू के थैले पर लिखकर दिए गए। इसके अलावा दिन में विवाह समारोह आयोजित किया गया ताकि सजावट के साथ ही और भी कई तरह के खर्चों से बचा जा सके।           जहाँ एक तरफ लोग शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं और कर्ज लेकर भी शादी के ख़र्चे व दहेज़ की मांग को पूरा करते है, तो दूसरी तरफ यह शादी सादगी की मिसाल कायम करती दिखती है और सामाजिक चिंताओ से भी रूबरू कराती है जिनसे यह समाज जूझ रहा है। पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ध्वनि प्रदूषण, खाद्य सामग...