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श्मशानों को अशुभ मानने की भ्रांति पर एक करारी चोट

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 आज दैनिक जागरण में छपी एक न्यूज़ जिसमें गुजरात स्थित गाँव तलगाजराड़ा मे नवविवाहित जोड़े ने श्मशान घाट में शादी के फेरे लिए,ने जहाँ मेरे अज्ञान की पुस्तक के एक अध्याय को समाप्त किया, वहीं अंधविश्वास विरोधी अस्त्र के रूप में यह समाचार मेरे हाथों में आ गया।      श्मशान को अशुभ या खराब मानने की भ्रांति सदियों से भारतीयों के मन मे अपनी पकड़ जमाये बैठी है जबकि हमको मालूम है जीवन का अटल सत्य मृत्यु है। जब पैदा होने वाले अस्पताल ,घर या अन्य स्थान को हम अशुभ नही मानते तो श्मशान ,जहाँ अटल सत्य विद्यमान है, को किस आधार पर अशुभ होने की संज्ञा दे देते है।            श्मशानों को भूतों का डेरा मानने वाले बच्चों के मन से से यह भ्रांति तब ही दूर की जा सकेगी जब उनका जन्मदिन व युवा होने पर उनके विवाह श्मशान घाटों को पवित्र स्थल मानकर उन्हीं में सम्पन्न कराए जाएं। साथ ही बच्चों को बताया जाए कि श्मशान स्थल कोई भय पैदा करने की जगह नही वरन शांति का वह स्थान है जहाँ मनुष्य को अपने जीवन के अटल सत्य के दर्शन होते है।

पद्मावती विवाद में संकीर्ण सोच के दर्शन

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            धार्मिक संकीर्णता की सीढ़ी चढ़ते हुए भारतीय समाज को सहिष्णुता का अर्थ समझाना ठीक ऐसा ही है जैसे रेगिस्तान में खेती करना। भारतीय समाज के अंदर तक जड़ें जमा चुकी धार्मिक संकीर्णता के दर्शन हालिया विवाद,जो आने वाली फिल्म पदमावती से संबंधित है,में हो जाते हैं। किसी भी विषय पर बिना विषय को समझे अपनी प्रतिक्रिया देना अपनी अल्पबुद्धि का परिचय देना है,जोकि वर्तमान में हो रहा है। इस फ़िल्म को रिलीज़ होने से रोकने से संबंधित याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने यह बोलकर विचार नही किया कि यह मामला सेंसर बोर्ड से संबंधित है और सेंसर बोर्ड़ ने इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नही दी है। जिस विषय पर अभी सेंसर बोर्ड तक का रूख स्पष्ट नही हो सका है उस विषय पर किस आधार पर विरोधी तत्त्वों ने यह मान लिया कि यह फ़िल्म जायसी के अमर महाकाव्य 'पद्मावत' की नायिका पद्मावती के साथ न्याय  करती नही दिखती।  लेकिन एक बात मेरी समझ से परे है वह यह कि कुछ फिल्मों का विरोध यह बोलकर किया जाता है कि ये फिल्में इतिहास के साथ  समुचित न्याय नही करती है लेकिन जब पाठ्यपुस्तकों में हल्द...

'हमारा क्या लेना देना'

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            अपने कर्तव्यों से आसानी से विमुख होने का सबसे आसान तरीका किसी विषय या व्यक्ति के प्रति यह बोलना कि हमारा क्या लेना देना है। इस समाज में व्याप्त ज्यादातर समस्याओं का समाधान लोग हमारा क्या लेना देना बोलकर ही निकाल लेते है। बहुत सी असुविधाओं को लोग इसलिए झेलते रहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि इस असुविधा को दूर करना किसी अन्य का काम है।      सड़क दुर्घटनाएं, झगड़े, प्राकृतिक व कृत्रिम आपदाएं, सरकार की असहनीय नीतियां, वैश्विक समस्याएं आदि जैसे अनेक विषयों पर लोग इस वजह से ध्यान देना जरूरी नही समझते क्योंकि उनको लगता है कि उन्हें खुद से संबंधित समस्याओं के प्रति ही चिंतन करना चाहिए ना कि दूसरे लोगों की समस्याओं के प्रति।   लेकिन हमें यह नही भूलना चाहिए कि अगर लोहे की किसी छड़ का एक सिरा गर्म किया जाता है तो उस छड़ का दूसरा सिरा ठंडा नही रह सकता। हम यह सोचकर चुप नही बैठ सकते कि अमेरिका में उत्सर्जित कार्बन या उत्तर कोरिया-अमेरिका युद्ध हम पर प्रभाव नहीं डालेगा क्योंकि हमारे देश की भौगोलिक दूरी रक्षा कवच का काम करेगी। अमेरिका स...

पटाखे प्रतिबंध पर लोगों का नज़रिया

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      सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों पर प्रतिबंध लगाना कुछ लोगों को इस तरह नागवार गुजरा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को अनेक सुझावों द्वारा यह बताया कि प्रदूषण को कैसे नियंत्रण में लाया जाए।दिवाली पर पटाखों को जलाने से होने वाले प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा DELHI- NCR मे पटाखे बेचने पर रोक लगा दी। लेकिन कुछ लोगों ने इस विषय को धार्मिक रंग देकर कुछ अलग ही अलाप छेड़ दिया, जिनमें एक प्रमुख व्यक्ति अलग ही नजर आता है क्योंकि इनके उपन्यासों के पात्र जहा एक तरफ धर्मों के बंधन तोड़ते हुए प्रेम और सदाचार की बात करते है तो वहीं वास्तविक जीवन में इस लेखक पर धार्मिकता हावी हो जाती है,इनका नाम चेतन भगत है। इनके जैसे अन्य ज्ञानी लोग भी धर्म से ऊपर नही उठ पाते।अगर इनका ये हाल है तो सामान्य लोगों से हम यह अपेक्षा कैसे कर सकते है कि ये धार्मिक उन्माद में न उलझकर उदारवाद का रास्ता अपनाएंगे।   हमें यह मालूम होना चाहिए कि विश्व पर सबसे बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन का है, जिसके परिप्रेक्ष्य मे पेरिस जलवायु समझौता लाया गया है, जिसका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन कम कर वैश्विक तापमान को...

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा में सोशल मीडिया का योगदान

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         प्रशासन और समाज से कुछ अच्छे की उम्मीद रखने वाला इस पृथ्वी का सामाजिक प्राणी, जिसको मानव कहा जाता है, खुद अच्छा बनने के लिए तैयार नही है। जिसका हालिया उदाहरण मुंबई के एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन के पैदल पुल पर मची भगदड़ से घायल हुए लोगों के साथ की गयी शर्मनाक हरकतों में मिलता है। वहाँ पर एक आदमी  ने घायल औरत की मदद करने की बजाय उसके कंगन चुराने को अहमियत दी, घायल लोगों की मदद की बजाय लोग वीडियो क्लिप बनाने में मशगूल थे और बाकी रही सही कसर उस व्यक्ति ने पूरी कर दी जिसने घायल महिला के साथ अश्लील हरकत की।           पहले भी ऐसे किस्से सुनने को मिले होंगे क्योंकि लोग मानवता का पाठ भूल कर एक संवेदनहीन दुनिया मे जी रहे हैं।आज कहीं भी अगर कुछ भी होता है तो लोग पीड़ित की मदद करने की बजाय उसके साथ हो रही घटना की वीडियो बनाकर उसको सोशल मीडिया पर शेयर कर उसमें अपनी ख़ुशी खोजने का प्रयत्न करते है। इसके अतिरिक्त सबको अपने खुशी के पलों को एन्जॉय करने की बजाय उस पल को कैमरे में कैद करने की जल्दी रहती है ताकि दूसरे लोगों को बताया जा सके कि व...