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असली सफलता का पैमाना दूसरे से तुलना नहीं बल्कि आत्मसंतुष्टि होनी चाहिए

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सामान्यतः अपने आप को विकास के चरम बिंदु पर ले जाने के लिए हम तुलना शब्द का प्रयोग करते हैं। तुलना करके हम जान पाते है कि हमसे कहां गलतियां हुईं और कहाँ हमने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। मेरे अनुसार अगर हमें अपनी तुलना अपने आप से करनी हो तो तुलना करना एक सर्वश्रेष्ठ कदम है लेकिन बात जब अपनी तुलना दुसरों से करने की आती है तो तुलना की परिभाषा मेरे अनुसार अपना अर्थ खोने लगती है। प्रायः ज्यातर लोगों से अपने अभिभावकों से यह जरूर सुना होगा कि अमुक के लड़के को देखों...वह कहाँ से कहाँ पहुंच गया और तुम यहीं पड़े रहना। अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी और एक अच्छा पारिवारिक जीवन यही सब सफलता के पैमाने बने हुए हैं। अगर कोई व्यक्ति अशिक्षित है या प्रतिष्ठित जॉब नही रखता या पारिवारिक जीवन सुखी नहीं है तो वह लोगों की नजरों में एक असफल इंसान घोषित हो जाता है जोकि सही पैमाना नहीं है। यह जरूरी नही कि प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा में ही रूचि दिखाए।एक खिलाड़ी कम शिक्षित हो सकता है, एक शिक्षित व्यक्ति को खेल में अरुचि हो सकती है, एक पेशेवर इंसान अपने पेशे में सफल हो सकता है लेकिन दूसरे क्षेत्र में असफल साबित हो ...

महिलाएँ मनोविज्ञान व व्यवहार परीक्षण सम्बंधित क्षेत्रों में निपुण क्यों?

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                    प्रायः महिलाओं के बारें में अक्सर यह कहा जाता है कि इनको शायद ही कोई समझ पाया हो। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, ज्ञानी व विद्वान लोग महिलाओं को समझने में असफल रहें हैं व इनके मन की गहराई को मापना किसी भी पुरुष की सीमाओं से परे है। महिलाएं किसी भी रहस्य को काफी समय तक बड़ी आसानी से दबाएं रख सकती है। लेकिन ऐसा क्यों हैं? इसी का वैज्ञानिक कारण खोजने का हम प्रयास करेंगें। समग्र रूप से, महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक ग्रहणक्षम होती हैं, और उनकी इस विशेषता को सामान्य रूप से 'महिलाओं की अंतर्दृष्टि' के रूप में सन्दर्भित किया जाता है। महिलाओं में सांकेतिक प्रतीकों को पहचान कर उनका अर्थ समझने तथा सूक्ष्म सूचनाओं को भी ग्रहण करने की सहज क्षमता होती है। इसलिए कुछ ही पति अपनी पत्नियों से झूठ बोलकर बच पाने में सक्षम होते हैं, और इसके ठीक विपरीत ,महिलाएं पुरुषों को आसानी से चकमा दे जाती हैं तथा उन्हें कदाचित ही इस बात का पता चलता है।             अधिकांश महिलाओं के मस्तिष्क की बनावट उन्हें संसार के क...

शिक्षा पद्धति में खामियां लेकिन दोषारोप युवाओं पर

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            दिन-प्रतिदिन बेरोजगारी की समस्या भयंकर रूप लेती जा रही है जिसका कारण हम बढ़ती जनसंख्या व युवाओं में कौशल की कमी को मान लेते है। प्रायः यह मान लिया जाता है कि बढ़ती जनसंख्या ही बेरोजगारी का प्रमुख कारण है और दूसरा, हमारे युवा उस कौशल से वंचित है जिसकी मांग रोजगार क्षेत्र में जरूरी है। बढ़ती जनसंख्या का समाधान तो चीन की "one child policy" की तर्ज पर किया जा सकता है लेकिन युवा उस कौशल से क्यों वंचित है जिसकी रोजगार क्षेत्र में जरूरत है। शिक्षा पद्धति में ऐसी क्या खामियां है कि एक शिक्षित युवा जब रोजगार के क्षेत्र में जाता है तो अपने आप को निस्सहाय खड़ा पाता है? इस पर विचार करने की जरूरत है।  शिक्षा में पहली खामी तो मुझे शिक्षा के माध्यम में ही नजर आती है। यह सर्वविदित है कि हमारी शिक्षा पद्धति मैकाले की देन है जोकि ब्रिटिश राज की जरूरतों को पूरा करने के लिए लाई गई। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को बनाना ब्रिटिश हितों की पूर्ति हेतु ही एक साधन था जिसका मकसद काली चमड़ी के अंग्रेजों को पैदा करना था जो शरीर से भारतीय और दिमाग से अंग्रेज होते और ब...

एक लड़की के लिए इज्जत की परिभाषा

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                     इस समाज के अनुसार एक लड़की की इज्जत उसकी योनि से जुड़ी होती है। तभी तो किसी लड़की का रेप होने पर समाचार पत्रों में "एक लड़की की इज्जत लूटी" वाक्य देखने को मिलता है। उसके व्यक्तित्व, बड़ों के प्रति आदर, व काम के प्रति निष्ठा जैसे गुणों से हमें घण्टा फर्क नहीं पड़ता है।   इसी का परिणाम है कि हमारी गालियों में मां, बहन या उनके प्राइवेट पार्ट शामिल है। परिवार की प्रतिष्ठा को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? परिवार की महिलाओं के बारे में अफवाहें फैला दो या उनका रेप कर दो। आखिर किसी न किसी तरह से घर-परिवार के इज्जत की पूरी जिम्मेदारी केवल महिलाओं के ही कंधों पर जो है। दंगों के समय सबसे ज्यादा घटनाएं रेप की देखी जाती है। कितनी बार आपने औरतों को पुरुषों से ये कहते हुए सुना है: माँ -बहन नहीं है क्या घर पर? ये बात बस उसे याद दिलाने के लिए कही जाती है कि उसे दूसरी औरतों का भी वैसे ही सम्मान करना चाहिए जैसे वह अपनी मां और बहन का सम्मान करता है। यह सब शुरू हुआ महिला को एक भोगवस्तु मानने से।

अर्द्धशिक्षित लोंगो से समाज को डर

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                    किसी ने कहा है कि अनपढ़ होने से बेहतर है   अर्द्धशिक्षित हो ना। लेकिन मैं इस विचार से असहमति रखता हूँ और एक लोकोक्ति'आधा ज्ञान ,जी का जंजाल' को अपना समर्थन देता हूँ। भारत की स्वतंत्रता के समय साक्षरता दर लगभग 8% थी जो कि आज की तुलना में बहुत कम थी।लेकिन मुझे उस समय की एक बात बहुत पसंद है कि उस समय के ये 8% शिक्षित लोग वास्तव में शिक्षित थे,  जो राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय या मत स्पष्ट रखते थे। अल्पसंख्यक होने के बावजूद इन शिक्षित लोंगो ने अपने ज्ञान के बल पर ब्रिटिश नीतियों की समीक्षा कर  अशिक्षित समाज को उससे रूबरू कराकर एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा कर दिया।                   आज शिक्षा दर 74% पर पहुँच गयी है। तुलना करने पर ये आंकड़े अच्छे तो लगते है लेकिन इन आंकड़ों में  अर्द्धशिक्षित   लोंगो को भीड़ शामिल है जो न तो अनपढ़ है और न ही पूरी तरह से शिक्षित है। यह आधा ज्ञान इनके लिए तो जंजाल तो है ही बल्कि समाज के लिए भी जंजाल बना हु...