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कामवेग का शिकार

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कहते हैं जब काम सिर पर चढ़ता है तो वहां से बुद्धि का पलायन हो जाता है। उस समय मनुष्य पशुता के स्तर पर आ जाता है। उसका विवेक शून्य हो जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति भी लज्जापूर्ण हरकतें करने लगता है। जब वासना का ज्वार उतरता है तब उसे अपनी ही बेवकूफियों पर हंसी आती है। वासना पुरुष के लिए स्त्री को सबसे कामुक और सुंदर बना देती है। उस समय उसे स्त्री के शरीर के इतर कुछ नही सूझता है, उसके स्वेद की गंध भी इत्र को धता बताती मालूम पड़ती है।  काम का वेग उतरने पर उसे वैराग्य का भाव उत्पन्न होता है। उसे यह सब दलदल मालूम पड़ता है। स्त्री उसे नरक का द्वार दिखने लगती है। लेकिन कुछ घंटों बाद पुरुष इसी द्वार पर फिर याचक बन खड़ा हो जाता है। अच्छे - अच्छे सुरमा जो किसी से पराजित नहीं हुए, काम के आगे परास्त हो जाते हैं। इस पर विजय पाने की चेष्टा भी व्यर्थ है। यह प्रकृति ही है जो काम के माध्यम से जिए जा रही है। जीवन की सृष्टि इसी वासना का फल है।  जब हम काम की बात करते हैं तो सोचते हैं कि पुरुष में ही काम ज्यादा पाया जाता है और स्त्री उस सिद्ध की तरह दिखाई पड़ती है जिसने काम को जीत लिया है, लेकिन ऐसा न...

तुम्हारा दोगलापन

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तुम्हारा एनिमल लवर होने का आधार खोखला है। तुम्हारा यह प्रेम सिलेक्टिव है, सिर्फ कुत्ते और बिल्लियों तक ही सीमित है। एक दिन तुम्हे अगर भैंस का गोबर उठाने, दूध दुहने और उसका चारा खेत से लाने में लगा दिया जाए, तो तुम्हारा ये प्रेम रफूचक्कर हो जायेगा। एनिमल तो भैंस भी है। लेकिन उसे पालने वाला तुम्हारी नज़र में गंवार है। देखा जाए तो हम हर जगह सिलेक्टिव हैं। हमें गांव, पहाड़, खेत पसंद आते हैं लेकिन वहां हम बसना नही चाहते। छः महीने में सिर्फ दो - चार दिन के लिए वहां छुट्टी मनाने जाना चाहते हैं। पेड़ों को काट शहर को बंजर बना हम गमले में पौधे लगा कर खुद को प्लांट लवर बोल लेते हैं। लड्डू गोपाल लाकर भक्ति का पाखंड करने लगते हैं। अपने बच्चे तो तुमसे ढंग से पल नही रहे। कुछ दिन ड्रामेबाजी करके लड्डू गोपाल की सेवा भी बच्चों के जिम्मे कर देते हो। बच्चे तुम्हारी मूर्खता का बोझ ढोते हैं। क्या ही भक्ति करोगे तुम अगर तुम्हारा मन छल, पाखंड, मोह, और ईर्ष्या का शिकार है! व्याभिचार करते वक्त लड़की की जाति और सूरत नही देखते, सिर्फ उसके शरीर पर मोहित हो जाते हो। शादी के लिए तुम्हे उसकी सात पुश्तें याद आ जाती है...

स्त्री और पुरुष के प्रेम में अंतर

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प्रत्येक प्रेमी युगल के बीच यही शिकायत रहती है कि मेरा पार्टनर मुझे उतना प्रेम नहीं करता जितना मैं करता/करती हूं। अधिकतर समस्याओं की जड़ यही है कि हम सोच लेते हैं कि सामने वाला उतनी ही गहनता से प्रेम करेगा जितनी गहनता से मैं करता हूं। उसके प्रेम करने का तरीका बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसा मेरा है। जबकि हम भूल जाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अलग है, सबके सोचने का तरीका अलग है, अपनी फिलिंग्स को जाहिर करने का तरीका अलग है,तो प्रेम जाहिर करने का एक सा तरीका कैसे हो सकता है? हो सकता है कि सामने वाला भी तुम्हें तुमसे ज्यादा प्रेम करता हो लेकिन उसका जाहिर करने का तरीका अलग हो। जैसे कोई व्यक्ति दुख में रोने लगता है, तो कोई मौन हो जाता है, कोई चीखता है। दुख को झेलने के सबके अपने अपने तरीके है। ऐसे ही प्रेम करना का सबका अपना तरीका है। सामान्यत: प्रेम विपरीतलिंगी से होता है। दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। स्त्रियां प्रेम अधिक गहनता से कर पाती हैं। वे प्रकृति के अधिक नजदीक हैं। उनमें भावनाओं का आवेश पुरुषों से अधिक होता है। एक छोटी सी बात उन्हे विचलित कर सकती है तो छोटी सी बात उन्हे खुश भी कर सकती है। उनका ...

अति प्रेम की भी बुरी।

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“कैसी चाहत है हमारी, जिसे चाहते हैं; उसे धीरे-धीरे नष्ट करते हैं।” - रामकुमार तिवारी कहते हैं अति हर चीज की बुरी होती है। परिजन अति प्रेम में अपने बच्चे का विकास अवरूद्ध कर देते हैं, एक तरफा प्रेमी ना सुनने के बाद तेजाब फेंक लड़की के उसी चेहरे को बिगाड़ देता है जिस पर वह इतना मोहित था, जलकुंभी जिस जल में पनपती है उसी के पोषण तत्वों को खत्म कर खुद का अस्तित्व ही संकट में डाल लेती है। प्रेम अच्छा है लेकिन अति उसकी भी बुरी है। हम इस विभाजन रेखा को कब लांघ जाते हैं, पता ही नहीं चलता। यह समझ ही नहीं पाते कि कब हम प्रेम करते - करते प्रेम का ही गला घोंटने लगते हैं। प्रेम का अर्थ स्वतंत्रता देना है, बंधन डालना नहीं। प्रेम बांधता नहीं, विकास के मार्ग खोलता है। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि प्रेमी तुम्हारे ही साथ हमेशा समय बिताए, तुम्ही को अपने जीवन का केंद्रबिंदु बना कर रखे। उसके जीवन में परिवार और दोस्त होते हैं, पढ़ना या जॉब करना भी होता हैं। इन सबके लिए भी समय निकलना होता है। इसके अतिरिक्त खुद के लिए भी समय देना होता है। एकांत हर व्यक्ति का मूल अधिकार है। एकांत ही वह समय है वह व्यक्ति खुद से साक्...

अपने लिए वकील, दूसरों के लिए जज

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कहा जाता है कि हर व्यक्ति खुद के लिए वकील और दूसरों के लिए जज होता है। हम अपने गलत को गलत नहीं कहते, बल्कि उसे सही ठहराने के प्रयास में कहते हैं कि तुम्हे मेरा गलत तो दिख गया और जो सामने वाला कर रहा है उसका क्या? अगर सामने वाला गलत कर रहा है तो हम उसी की भाषा में जवाब देकर कैसे सही कर रहे हैं? अगर वह गलत है तो तुम सही कैसे हुए? कभी पूछना खुद से यह प्रश्न। एक महिला के दारू पीने या व्याभिचार करने पर जब सवाल उठाया जाता है तो वह बोलती है कि जब पुरुष पीते हैं तब तो कुछ नहीं बोलते और आज मैं करने लगी हूं तो मुझ पर सवाल उठाने लगे। जबकि उसको यह नहीं पता कि शराब और व्याभिचार दोनों गलत है, चाहे फिर किसी भी जेंडर का व्यक्ति करें। महिलाओं से साथ शोषण होता है, उसका विरोध करने की बजाय पावर में आते ही ये खुद पुरुषों का शोषण करने लगती हैं और अपने को जस्टिफाई करते हुए बोलते हैं कि हमारे साथ भी तो ऐसा हुआ था तब तो कुछ नहीं बोले। यह ठीक ऐसा ही है जैसा प्रेमचंद अपने एक उपन्यास में लिखते हैं शोषित भी पावर हाथ में आते ही शोषक बन जाता है। ब्याज पर कर्ज लेने वाला व्यक्ति जो ब्याज देने पर बहुत दुखी होता है और इ...